20 Feb 2025
Vivek Singh
जहांआरा बेगम (1614-1681), मुगल सम्राट शाहजहां और मुमताज महल की सबसे बड़ी बेटी थीं. वे एक कुशल राजनीतिज्ञ, कवयित्री और सूफी विचारधारा से प्रभावित थीं.
जहांआरा का जन्म 23 मार्च 1614 को अजमेर में हुआ था. उनके पिता शाहजहां और माता मुमताज महल थीं. वे बचपन से ही बुद्धिमान और धार्मिक प्रवृत्ति की थीं.
जहांआरा को "शाहजादी-ए-हिंदुस्तान" और "पादशाह बेगम" की उपाधि मिली. उनकी मां की मृत्यु के बाद वे शाहजहां की सबसे करीबी सलाहकार बनीं.
जहांआरा सूफी मत से गहराई से प्रभावित थीं. वे ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती और मियां मीर की अनुयायी थीं और आध्यात्मिक शांति में विश्वास रखती थीं.
जहांआरा ने "मुनीस-उल-अरवाह" नामक पुस्तक लिखी, जो सूफी विचारों पर आधारित थी. वे फारसी और अरबी भाषा में दक्ष थीं.
जहांआरा ने उत्तराधिकार संघर्ष में अपने भाई दारा शिकोह का समर्थन किया. हालांकि औरंगजेब ने सत्ता पाने के बाद भी उन्हें "पादशाह बेगम" की उपाधि दी.
जहांआरा ने दिल्ली में चांदनी चौक और जहांआरा सराय का निर्माण कराया. वे व्यापार और नगर नियोजन में भी रुचि रखती थीं.
शाहजहां ने उन्हें आगरा, दिल्ली सहित कई स्थानों की जागीरें सौंपी, जिससे उन्हें भारी राजस्व प्राप्त होता था. 1644 में जब उनके महल में आग लगी, तब शाहजहां ने उन्हें 10 लाख रुपये (1 मिलियन रुपये) का अनुदान दिया था, उनकी संपत्ति का अनुमान पांच करोड़ रुपये से अधिक था, जो आज के हिसाब से अरबों रुपये के बराबर हो सकता है.
जहांआरा बेगम का 16 सितंबर 1681 को दिल्ली में निधन हुआ. उनकी इच्छा के अनुसार, उन्हें एक साधारण कब्र में दफनाया गया, जिस पर लिखा है "इस निर्धन व्यक्ति के लिए प्रार्थना करें".