कौन चलाता है Porter जिसने 10 साल में कमा लिए 1750 करोड़, UBER से मिला था आईडिया
भारत में लॉजिस्टिक्स सेक्टर का हाल बेहाल था. महंगे किराए, देरी और बिखरी हुई व्यवस्था से छोटे व्यापारियों को सबसे ज्यादा नुकसान होता था. लेकिन एक स्टार्टअप ने उबर जैसी टेक्नोलॉजी से इस सेक्टर को बदलने की ठानीऔर फिर लॉजिस्टिक्स का बाजार देश में बदल गया.
Porter Success Story: भारत में लॉजिस्टिक्स क्षेत्र लंबे समय से अव्यवस्थित और महंगा रहा है. वित्तीय वर्ष 2023 में यह देश की GDP का 14 फीसदी तक पहुंच गई, जबकि चीन में यह सिर्फ 10 फीसदी थी. यानी भारत में सामान लाने-ले जाने का खर्च बहुत ज्यादा है, जिससे व्यापारियों और ग्राहकों दोनों पर बोझ बढ़ता है. इस समस्या को हल करने के लिए सरकार ने 2022 में राष्ट्रीय लॉजिस्टिक्स नीति लागू की, जिसका लक्ष्य लागत को 8 फीसदी तक लाना था. लेकिन सरकार के कदमों के अलावा, निजी कंपनियों और स्टार्टअप्स की भी इसमें बड़ी भूमिका हो सकती है. पोर्टर ऐसा ही एक स्टार्टअप है, जिसने सामान की ढुलाई को सस्ता, आसान और डिजिटल बनाने में बड़ी सफलता हासिल की है.
इन्ट्रा-सिटी लॉजिस्टिक्स की समस्या
किसी भी देश की अर्थव्यवस्था के लिए अच्छी लॉजिस्टिक्स व्यवस्था जरूरी होती है. लेकिन भारत में शहर के अंदर सामान ढोने का काम बहुत ही बेतरतीब ढंग से चलता है. छोटे व्यापारी जब सामान भिजवाने के लिए वाहन ढूंढते हैं तो उन्हें कई मुश्किलों का सामना करना पड़ता है. कभी ड्राइवर नहीं मिलते, कभी किराया बहुत ज्यादा होता है तो कभी डिलीवरी समय पर नहीं होती. भारत में 90 फीसदी लॉजिस्टिक्स सेक्टर असंगठित है यानी इसमें कोई तय नियम-कानून या डिजिटल सिस्टम नहीं है.
इन्हीं दिक्कतों को हल करने के लिए पोर्टर आया, जिसने वाहन बुकिंग को मोबाइल ऐप से जोड़कर पूरे सिस्टम को आसान बना दिया.
पोर्टर की शुरुआत
पोर्टर की शुरुआत 2014 में IIT खड़गपुर के दो दोस्त उत्तम दिग्गा और प्रणव गोयल ने की थी. वे दोनों उस समय JP Morgan में नौकरी कर रहे थे, जब उन्हें लॉजिस्टिक्स सेक्टर में सुधार की जरूरत का एहसास हुआ. उन्हें Uber से प्रेरणा मिली, जिसने टैक्सी सर्विस को डिजिटल बनाकर आसान कर दिया था. उन्होंने देखा कि शहरों में छोटे ट्रक और लोडिंग वाहन ज्यादातर समय खाली खड़े रहते हैं, जबकि व्यापारी इन्हें आसानी से बुक नहीं कर पाते.
समस्या को समझने के लिए उन्होंने 500 से ज्यादा ट्रक चालकों से बात की. उन्हें पता चला कि ये ड्राइवर रोज सिर्फ 1-2 राइड ही कर पाते थे जबकि उनके पास 4-5 ट्रिप करने की क्षमता थी. यानी इनका सही इस्तेमाल नहीं हो रहा था. इस समस्या का हल निकालने के लिए उन्होंने पोर्टर लॉन्च किया, जो डिजिटल प्लेटफॉर्म के जरिए ड्राइवरों और ग्राहकों को जोड़ता है.
शुरुआती दिनों में उनके पास कोई ऐप नहीं था. दिग्गा ड्राइवरों को जोड़ने का काम करते थे, जबकि गोयल ग्राहक खोजते थे. वे सिर्फ फोन और गूगल शीट्स की मदद से बुकिंग संभालते थे. उन्होंने व्यापारियों को यह भरोसा दिया कि पोर्टर की सर्विस दूसरों से 20% सस्ती होगी. धीरे-धीरे व्यापारियों को यह पसंद आने लगा और 3,000 बुकिंग हर महीने होने लगीं.
इस शुरुआती सफलता के बाद पोर्टर ने निवेशकों का ध्यान खींचा. कंपनी ने पहले दौर में 500,000 डॉलर (लगभग 4 करोड़ रुपये) की फंडिंग जुटाई और बाद में 5.5 मिलियन डॉलर (करीब 45 करोड़ रुपये) का निवेश हासिल किया.
कठिनाइयों का दौर और सीख
शुरुआती सफलता के बाद 2015 में पोर्टर ने इंटरसिटी लॉजिस्टिक्स में हाथ आजमाने की कोशिश की. लेकिन यह फैसला गलत साबित हुआ, क्योंकि यह पहले से ही बड़ा और प्रतिस्पर्धी बाजार था. इससे कंपनी को नुकसान हुआ और उन्हें यह सेवा बंद करनी पड़ी. इस दौरान कंपनी को कुछ कर्मचारियों की छंटनी भी करनी पड़ी.
इसके बाद पोर्टर ने अपनी मुख्य सेवा, शहर के अंदर सामान ढुलाई पर ही ध्यान देने का फैसला किया.पोर्टर ने धीरे-धीरे अपनी सर्विस को और बेहतर बनाया. उन्होंने अपने ऐप में GPS ट्रैकिंग और रियल-टाइम अपडेट जोड़े, जिससे ग्राहक आसानी से देख सकते थे कि ड्राइवर कहां पहुंचा है. महिंद्रा ग्रुप ने पोर्टर के इस मॉडल को देखकर अपने लॉजिस्टिक्स प्लेटफॉर्म “SmartShift” को पोर्टर के साथ मिला दिया और इसमें 10 मिलियन डॉलर (लगभग 80 करोड़ रुपये) का निवेश किया.
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तेजी से विस्तार और भविष्य की योजनाएं
2020 में पोर्टर ने दो-पहिया पार्सल डिलीवरी की सेवा शुरू की और देखते ही देखते बेंगलुरु में Dunzo जैसे बड़े ब्रांड को पीछे छोड़ दिया. 2021 में कंपनी ने 100 मिलियन डॉलर (करीब 800 करोड़ रुपये) की नई फंडिंग जुटाई और अपने ऑपरेशन को 20 से ज्यादा शहरों तक बढ़ा लिया. FY23 में पोर्टर का कुल राजस्व 1,750 करोड़ रुपये तक पहुंच गया. अब कंपनी की योजना 100 से ज्यादा शहरों तक अपनी सेवाएं फैलाने की है.