मार्च में मैन्‍युफैक्‍चरिंग सेक्‍टर का दिखा दम, 8 महीने के हाई पर PMI, 56.3 से बढ़कर 58.1 पर पहुंचा

HSBC और S&P ग्लोबल की ओर से 3 अप्रैल को जारी रिपोर्ट के मुताबिक मार्च में भारत के मैन्‍युफैक्‍चरिंग सेक्‍टर में तेजी देखने को मिली, जिससे PMI बढ़कर 58.1 पर पहुंच गया है. मांग बढ़ने से फैक्ट्रियों ने रफ्तार पकड़ी, तो कहां से मिले सबसे जयादा ऑर्डर और इससे क्‍या हुआ असर यहां, देखें पूरी जानकारी.

मार्च में PMI उछला Image Credit: Chadchai Ra-ngubpai/Moment/Getty Images

PMI Report: भारत की मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में मार्च 2025 में जबरदस्त उछाल देखने को मिला है. फैक्ट्रियों के रफ्तार पकड़ने की वजह से इस सेक्‍टर में फरवरी के मुकाबले मार्च में अच्‍छी ग्रोथ देखने को मिली है. HSBC और S&P ग्लोबल की ओर से 3 अप्रैल यानी बुधवार को जारी रिपोर्ट के मुताबिक, मैन्युफैक्चरिंग परचेजिंग मैनेजर्स इंडेक्स (PMI) फरवरी के 56.3 से बढ़कर 58.1 पर पहुंच गया. ये तेजी नए ऑर्डर्स में शानदार बढ़ोतरी की वजह से आई है, जिससे ये आठ महीने के सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंच गया.

नए ऑडर्स का इंडेक्‍स 8 महीने के हाई पर पहुंचा

HSBC की चीफ इंडिया इकोनॉमिस्ट प्रांजुल भंडारी ने बताया कि मार्च में PMI 58.1 पर पहुंचा, जो पिछले महीने से बेहतर है. नए ऑर्डरों की भरमार के चलते इंडेक्स 61.5 पर पहुंचकर आठ महीने के रिकॉर्ड हाई पर पहुंच गया. हालांकि अंतरराष्ट्रीय ऑर्डर्स की रफ्तार थोड़ी धीमी रही, लेकिन कुल मांग में मजबूत बनी रही. मांग में इजाफा होने की वजह से कंपनियों ने अपने तैयार माल के स्टॉक को तेजी से इस्तेमाल किया, जिससे पिछले तीन साल में सबसे तेज गिरावट दर्ज हुई. इस कमी को पूरा करने के लिए कंपनियों ने सात महीने में सबसे तेज रफ्तार से कच्चा माल खरीदा और प्रोडक्शन किया. डेटा के मुताबिक एशिया, यूरोप और मिडिल ईस्ट से सबसे ज्‍यादा मांग देखने को मिली.

फरवरी में धीमी थी रफ्तार

फरवरी 2025 में PMI 56.3 पर आ गया था, जो 14 महीने का सबसे निचला स्तर था. उस वक्त प्रोडक्शन और सेल्स में कमजोरी के अलावा कच्चे माल की खरीद भी धीमी पड़ गई थी, लेकिन मार्च में इसमें दोबारा तेजी देखने को मिली.

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क्‍या है मैन्युफैक्चरिंग PMI?

PMI एक आर्थिक संकेतक है जो मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर की सेहत को मापता है. ये खरीद प्रबंधकों के सर्वे पर आधारित होता है और प्रोडक्शन, नए ऑर्डर्स, रोजगार, सप्लायर डिलीवरी और इन्वेंट्री जैसे पहलुओं की जानकारी देता है. इसे अर्थव्यवस्था का शुरुआती संकेतक माना जाता है, जो कारोबारियों, नीति निर्माताओं और निवेशकों को ट्रेंड समझने में मदद करता है.