क्या है वह शराब घोटाला, जिससे खिसक गई केजरीवाल की जमीन

अरविंद केजरीवाल की पार्टी सत्ता से बाहर हो गई है. पिछले दो चुनावों में आम आदमी पार्टी ने प्रचंड जीत दर्ज की थी, लेकिन इन चुनावों में पार्टी और खुद केजरीवाल, अन्ना आंदोलन के बाद जनता में जो भरोसा बनाया था, वह खो दिए.

अरविंद केजरीवाल की पार्टी सत्ता से बाहर होती दिखाई दे रही है. Image Credit: TV9 Bharatvarsh

Liquor Scam: दिल्ली विधानसभा चुनाव के नतीजे आ गए हैं, बीजेपी की सरकार राजधानी में सत्ता पर काबिज हो गई है. अरविंद केजरीवाल की पार्टी सत्ता से बाहर हो गई. चुनावी नतीजे आने के बाद खुद पार्टी के मुखिया अरविंद केजरीवाल अपनी सीट से हार गए. पिछले दो चुनावों में आम आदमी पार्टी ने प्रचंड जीत दर्ज की थी, लेकिन इस बार के विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी और खुद केजरीवाल, अन्ना आंदोलन के बाद जनता में जो भरोसा बनाया था, वह खोते हुए दिखे. केजरीवाल की इस स्थिति के लिए सबसे जिम्मेदार कथिक तौर पर 10,000 करोड़ रुपये के शराब घोटाले को माना जा रहा है. इस घोटाले में पार्टी के लगभग सभी बड़े नेताओं को जेल जाना पड़ा और इसी घोटाले के कारण केजरीवाल की छवि भी धूमिल हो गई. यहां तक कि उन्हें भी जेल जाना पड़ा.

क्या थी दिल्ली शराब पॉलिसी

दिल्ली की शराब नीति के तहत, शहर को 32 क्षेत्रों में बांटा गया, जहां हर क्षेत्र में 27 शराब विक्रेता थे. इसका मकसद शराब माफिया और काली मार्केटिंग को खत्म करना, राजस्व बढ़ाना, उपभोक्ता अनुभव सुधारना और शराब विक्रेताओं का समान डिस्ट्रब्यूशन सुनिश्चित करना था. यह कदम सरकार के शराब बिक्री से बाहर निकलने का संकेत था. सरकार ने लाइसेंस धारकों के नियमों में लचीलापन दिया, जिससे उन्हें छूट देने और अपनी कीमतें तय करने की अनुमति मिली. इससे विक्रेताओं द्वारा छूट दी गई, जिसके कारण भीड़ आकर्षित हुई. विपक्ष के विरोध पर एक्साइज विभाग ने कुछ समय के लिए छूट वापस ले ली. नई एक्साइज नीति 2021-22 के लागू होने के बाद, सरकार का राजस्व 27 फीसदी बढ़कर लगभग 8,900 करोड़ रुपये हो गया था.

केजरीवाल पर क्या आरोप

ED के मुताबिक, दिल्ली एक्साइज पॉलिसी के घोटाले में अरविंद केजरीवाल नई आबकारी नीति बनाने में मुख्य साजिशकर्ता रहे हैं, जिसके जरिए रिश्वत ली गई और इस रिश्वत के पैसे का इस्तेमाल गोवा चुनाव में भी किया गया. ED का दावा है कि केजरीवाल के करीबी विजय नायर, जो उनके घर में रहते थे और मीडिया प्रभारी भी थे, उन्हेंने रिश्वत लेने में भागीदारी निभाई. साथ ही, उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया के साथ मुलाकात के दौरान नीति से जुड़ी फाइल भी दी गई. इसके अलावा इसके अलावा CAG की एक रिपोर्ट में खुलासा किया गया है कि दिल्ली की अब रद्द की गई शराब नीति के अमल करने में कथित अनियमितताओं के कारण सरकार को 2,026 करोड़ रुपये का राजस्व नुकसान हुआ है.

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क्यों लगे घोटाले का आरोप

शराब बेचने के लिए ठेकेदारों को लाइसेंस लेना पड़ता है, जिसके लिए सरकार ने अलग-अलग कैटेगोरी तय की हैं – जैसे शराब, बीयर, विदेशी शराब आदि. उदाहरण के लिए, पहले लाइसेंस के लिए 25 लाख रुपये देने पड़ते थे, लेकिन नई शराब नीति के लागू होने के बाद यह राशि बढ़कर पांच करोड़ रुपये हो गई. आरोप है कि दिल्ली सरकार ने जानबूझकर बड़े शराब कारोबारियों को फायदा पहुंचाने के लिए लाइसेंस शुल्क बढ़ाया, जिससे छोटे ठेकेदारों की दुकानें बंद हो गईं और बाजार में केवल बड़े शराब माफियाओं को लाइसेंस मिला. विपक्ष का कहना है कि इसके बदले में आप पार्टी के नेताओं और अधिकारियों को शराब माफियाओं ने मोटी रकम घूस के रूप में दी. तो वहीं सरकार का तर्क है कि लाइसेंस फीस बढ़ाने से एकमुश्त राजस्व प्राप्त हुआ, जिससे उत्पाद शुल्क और वैट में हुई कटौती की भरपाई हो गई.