2025: कोविड के बाद सबसे उथल-पुथल भरा साल, 4 बड़े बदलाव जो दुनिया को बदल देंगे
हम सब उस दौर में हैं जब दुनिया एतिहासिक तौर पर बदल रही है. अमेरिकी टैरिफ ने पूरी दुनिया को मुश्किल में डाल दिया है. दूसरी तरफ AI नौकरियां खत्म कर रहा है. तेजी बदलती इस तकनीक ने लोगों के माथे पर चिंता की लकीरें खींच दी हैं. भविष्य कैसा होगा ये तो वक्त तय करेगा, लेकिन एक चीज साफ है कि मौजूदा वक्त के जैसा तो नहीं ही होगा.
साल 2025, कोविड के बाद दुनिया के लिए सबसे उथल-पुथल वाला साल है. पूरी दुनिया के डायनमिक्स बदल रहे हैं. दोस्त, दोस्त नहीं रहा, दुश्मन, दुश्मन नहीं रहा. वैश्विक व्यापार में तेजी से उलट-फेर हो रहे हैं. इन सबके केंद्र में हैं डोनाल्ड ट्रंप. डोनाल्ड ट्रंप के दोबारा अमेरिका के राष्ट्रपति बनने के बाद से ही दुनिया में अस्थिरता है. अमेरिका का सहयोगी रहा यूक्रेन, उन अजीब मुश्किलों से घिरा है जिसे खुद उसके सहयोगी अमेरिका ने खड़ा किया है.
उधर अमेरिका, ग्रीनलैंड पर दावा कर रहा है और आश्चर्यजनक रूप से रूस उसका समर्थन कर रहा है. जो लंबे समय से उसका दुश्मन रहा है. चीन जो अमेरिका से तो दूर है, रूस का सहयोगी भी है लेकिन अमेरिका का सबसे बड़ा बिजनेस साझेदार है. उधर AI के आम जीवन में आने के बाद बड़े पैमाने पर लोगों की नौकरियां जाने का खतरा है.
अमेरिकी टैरिफ ने पूरी दुनिया को मुश्किल में डाल दिया है. ऐसा लग रहा है कि हम फिर से एक नये कोल्ड वॉर के दौर में जा रहा हैं जहां टैरिफ हथियार है.
हम सब उस दौर में हैं जब दुनिया एतिहासिक तौर पर बदल रही है. साल 2025 में कुछ चीजें ऐसी हो रही हैं या हो चुकी हैं जो लंबे समय तक इतिहास के पन्ने पर दर्ज रहेंगी.
अमेरिकी टैरिफ का आतंक
दोस्त क्या दुश्मन क्या? अमेरिका ने सभी पर टैरिफ लगाया है. शब्द निकला रेसिप्रोकल, यानी जैसे को तैसा. अमेरिका ने दुनियाभर के देशों पर टैरिफ लगाया. दोस्तों यानी यूरोपीय देशों पर भी और दुश्मनों यानी चीन पर भी. किसी पर कम तो किसी पर ज्यादा. यानी दुनिया के बाकी मुल्कों को अमेरिका में अपना सामान बेचना मुश्किल होगा. ट्रंप ने 10 फीसदी टैरिफ तो सभी देशों से आने वाले उत्पादों पर लगा दिया. उसके बाद अलग-अलग देशों पर डिस्काउंटेड रेसिप्रोकल टैरिफ. भारत पर भी 26 फीसदी टैरिफ लगा है.
टैरिफ को समझेंं
टैरिफ को आसान भाषा में समझें तो जो भारतीय सामान अमेरिका में 100 रुपये मिल सकता है वो 27 फीसदी टैरिफ के बाद 127 रुपये का हो जाएगा. अमेरिकी ग्राहक के लिए भारतीय सामान महंगे हो जाएंगे. ट्रंप को भरोसा है कि इससे दो चीजें होंगी. पहली अमेरिकी लोग अमेरिकी सामान खरीदेंगे क्योंकि वो सस्ता पड़ेगा. दूसरा बाकी मुल्क अपने यहां लगा रहे अमेरिकी उत्पादों पर टैरिफ कम करेंगे जिससे अमेरिका का सामान दुनिया के बाकी मुल्कों में आसानी से बिकेगा.
इसका नुकसान ये होगा कि बहुत से देशों की कंपनियां जो अपने देशों में सामान बनाती है क्योंकि वहां लागत कम पड़ती है उन्हें अमेरिका में सामान बेचने में कठिनाई आएगी. अगर वो अमेरिका में ही सामान बनाएंगे तो लागत बढ़ जाएगी. यानी दोनों तरफ से मुश्किल है.
भारत जैसे देश जहां तटस्थ स्थित में हैं वहीं चीन समेत कुछ देश पलटवार करना चाहते हैं यानी बदले में वो भी टैरिफ लगाना चाहते हैं.
इसका नुकसान ये होगा कि अमेरिका समेत बाकी मुल्कों में वस्तुओं की कीमतें बढ़ेंगी. कीमतें बढ़ेंगी तो लोग खरीदारी नहीं करेंगे. जिससे मंदी के आने की संभावना प्रबल होगी. मंदी आएगी तो लोगों की नौकरियां जाएंगी. नौकरियां जाएंगी तो मंदी लंबे समय तक रहेगी.
दुनियाभर के बाजारों में उथल-पुथल
वैसे भी ट्रंप के आने के बाद दुनियाभर के बाजारों में उथल पुथल है. बड़े निवेशक बाजार से पैसा निकाल रहे हैं. भारतीय शेयर बाजार ट्रंप के आने के बाद से लगभग 20 फीसदी गिर चुका था, अभी कुछ सुधार है लेकिन अब भी अपने उच्चतम स्तर से 12-13 फीसदी नीचे है. टैरिफ के एलान के बाद अमेरिकी और कुछ एशियाई बाजार धाराशाही हो गए हैं.
यानी व्यापारी और नौकरीपेशा दोनों की हालत ठीक नहीं है.
AI: काम तो आसान कर रहा लेकिन नौकरियां छीन रहा
ऐसा माना जाता है कि नई टेक्नोलोजी नई नौकरियां पैदा करती हैं. लेकिन आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस के आने के बाद लगता है कि ये वाक्य सही नहीं है. आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस की वजह से अगले दो सालों के अंदर कंप्यूटर या मशीन के लिए जरिए होने वाली नौकरियों में बड़ी कटौती हो सकती है.
वो सभी काम जिन्हें करने में घंटों का समय लगता है वो AI कुछ मिनट में कर दे रही है. जिन नौकरियों पर सबसे ज्यादा खतरा हैं उनमें वो काम हैं जो repetitive, rule-based या data-driven हैं.
AI और मशीन लर्निंग टूल्स, जैसे ऑप्टिकल कैरेक्टर रिकग्निशन (OCR) और प्राकृतिक भाषा प्रसंस्करण (Natural language processing), डेटा को तेजी से और सटीकता से प्रोसेस कर सकते हैं. रोबोटिक्स और AI-संचालित मशीनें उत्पादन प्रक्रियाओं को ऑटोमेट कर रही हैं, जिससे मानव श्रम की जरूरत कम हो रही है.
साथ ही AI Chatbot, Voice Assistant, और Self-Checkout सिस्टम ग्राहक पूछताछ और बिक्री प्रक्रियाओं को संभाल रहे हैं. आपने ध्यान दिया होगा कि पहले आप कस्टमर केयर में किसी इंसान से बात करते थे अब वो काम AI Chatbot कर रहा है. वहां ग्राहक सेवा अधिकारी की जरूरत अब कम हो जाएगी.
(self-driving cars/trucks और ड्रोन डिलीवरी सिस्टम ड्राइवरों और डिलीवरी कर्मियों की जरूरत को कम कर रहे हैं. आपने टेस्ला की गाड़ियों का वीडियो देखा होगा, जो खुद से चल रही हैं. कुछ देशों में पहले से ट्रायल हो रहे थे लेकिन अब इसमें तेजी आएगी. यानी भविष्य में ड्राइवर्स की नौकरी कम होगी.
AI टूल्स टैक्स गणना, बहीखाता, और बुनियादी वित्तीय विश्लेषण को आसानी से खुद कर सकते हैं. यानी वो तमाम लोग जो बड़ी-बड़ी गणनाओं, टैक्स कैलकुलेशन और तमाम चीजों के लिए कई दिन काम करते थे वो अब मिनटों में हो रहा है.
जिन डॉक्यूमेंट्स को वकील महीनों पढ़ते थे या रिसर्च करते थे वो अब AI की मदद से दस्तावेजों की समीक्षा, अनुबंध विश्लेषण, और कानूनी शोध तेजी से कर सकते हैं.
AI इंसानों को छोड़ रहा पीछे
इसके अलावा मैं जो लिख रहा हूं वो AI मेरे से बेहतर अब लिख सकता है. न केवल पत्रकारिता में बल्कि अब मेडिकल साइंस में AI क्रांति कर रहा है. AI-संचालित इमेजिंग टूल्स और डायग्नोस्टिक सॉफ्टवेयर बीमारियों का पता लगाने में इंसानों को पीछे छोड़ रहे हैं.
यानी AI का प्रसार मानव की सोचने की क्षमता को तेजी से आगे तो ले जा रहा है लेकिन साथ ही बड़े पैमाने पर नौकरियों को खत्म कर रहा है.
कंपनियां प्रॉफिट के लिए काम करती हैं, जो काम 20 लोग लगाकर 10 दिन में हो सकता है वो काम अगर 1 दिन में एक मशीन लगाकर हो सकता है तो कंपनियां मशीन ही चुनेंगी. यानी आने वाले दिनों में AI की वजह से दुनियाभर में करोड़ों नौकरियां जा सकती हैं.
2023 के गोल्डमैन सैक्स की रिपोर्ट के मुताबिक दुनियाभर में 300 मिलियन यानी की करीब 30 करोड़ नौकरियां प्रभावित हो सकती हैं.
अंतरिक्ष अब पर्यटन का नया केंद्र
मानव लगातार अंतरिक्ष की गहराइयों को विस्मय की नजर से देखता रहा है. साल 2025 अंतरिक्ष इतिहास के महत्वपूर्ण सालों में एक है. हाल ही में अमेरिकी अंतरिक्ष यात्री सुनिया विलियम्स को इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन से सुरक्षित धरती पर वापस लाया गया है. यह काम नासा ने अकेले नहीं किया, बल्कि एलन मस्क की कंपनी स्पेस एक्स और नासा ने मिलकर किया.
पिछले सालों में निजी स्पेस कंपनियों ने इस दिशा में जो प्रगति की है उससे यह साफ है कि आने वाले दिनों में स्पेस नया टूरिस्ट स्पॉट होगा. जैसे लोग विदेश घूमने जाते हैं वैसे ही आने वाले दिनों में स्पेस में छुट्टियां मनाने जा सकते हैं.
भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) इस साल अपने कई महत्वपूर्ण मिशनों को अंजाम देने की योजना बना रहा है. उदाहरण के लिए, गगनयान मिशन का पहला मानवरहित परीक्षण 2025 में प्रस्तावित है, जिसमें ह्यूमनॉइड रोबोट “व्योममित्र” को अंतरिक्ष में भेजा जाएगा. यह भारत के पहले मानव अंतरिक्ष मिशन की दिशा में एक बड़ा कदम होगा.
इसके अलावा, इसरो और नासा के संयुक्त मिशन NISAR (नासा-इसरो सिंथेटिक अपर्चर रडार) पृथ्वी की निगरानी, जलवायु परिवर्तन और प्राकृतिक आपदाओं के अध्ययन में क्रांतिकारी योगदान देगा
नासा का आर्टेमिस-2 मिशन, जो सितंबर 2025 में लॉन्च हो सकता है, चंद्रमा के चारों ओर मानवयुक्त उड़ान भरकर भविष्य के चंद्र अभियानों की नींव रखेगा. यह मिशन अंतरिक्ष की खोज में नई संभावनाएं खोलेगा. इसके अलावा, निजी कंपनियां जैसे SpaceX और Blue Origin भी अंतरिक्ष पर्यटन को आसान करने की दिशा में काम कर रही हैं.
क्रिप्टो करेंसी और ब्लॉकचेन
क्रिप्टो करेंसी पिछले कई सालों से बाजार में है. लेकिन साल 2025 में पहली बार बिटकॉइन ने एक लाख भारतीय रुपये का आंकड़ा छुआ.
रिलायंस ने जियो कॉइन लॉन्च किया, जो एक ब्लॉकचेन-आधारित रिवॉर्ड टोकन है. इसका उद्देश्य यूजर्स को डिजिटल इंटरैक्शन के लिए इनाम देना है, जो भारत में क्रिप्टो के रोजमर्रा के उपयोग को बढ़ावा दे सकता है.
दुबई लैंड डिपार्टमेंट ने “रियल एस्टेट टोकनाइजेशन प्रोजेक्ट” शुरू किया, जो मिडिल ईस्ट में प्रॉपर्टी टाइटल डीड को टोकनाइज करने वाला पहला कदम है. यह ब्लॉकचेन के रियल वर्ल्ड एसेट्स (RWA) में उपयोग का उदाहरण है.
USDC जारी करने वाली कंपनी सर्कल 2025 में $CRCL टोकन के साथ IPO की योजना बना रही है, जो स्टेबलकॉइन्स के वित्तीय बाजार में एकीकरण को दर्शाता है. साथ ही, अपराधियों द्वारा मोनेरो की घटती तरलता के कारण बिटकॉइन की ओर बढ़ने की खबरें हैं, जिससे रेगुलेटरी ध्यान बढ़ रहा है.
मार्च 2025 में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक Executive Order पर हस्ताक्षर किए, जिसके तहत “स्ट्रैटेजिक बिटकॉइन रिजर्व” और “यूएस डिजिटल एसेट स्टॉकपाइल” की स्थापना की गई. यह निर्णय अमेरिका को “क्रिप्टो कैपिटल ऑफ द वर्ल्ड” बनाने के ट्रंप के दृष्टिकोण का हिस्सा है.
यह रिजर्व अमेरिकी सरकार के पास पहले से मौजूद बिटकॉइन से शुरू होगा, जो मुख्य रूप से आपराधिक और नागरिक संपत्ति जब्ती (forfeiture) के माध्यम से प्राप्त हुआ है. अनुमान है कि अमेरिका के पास लगभग 200,000 बिटकॉइन हैं, जिनकी कीमत $17 बिलियन से अधिक हो सकती है. सरकार इस बिटकॉइन को बेचेगी नहीं, बल्कि इसे एक रिजर्व संपत्ति के रूप में रखेगी, जिसे “डिजिटल फोर्ट नॉक्स” के रूप में देखा जा रहा है.
इसमें बिटकॉइन के अलावा अन्य क्रिप्टोकरेंसी शामिल होंगी, जैसे कि एथेरियम (ETH), XRP, सोलाना (SOL), और कार्डानो (ADA).
यानी दुनिया 2025 में बदल रही है. दुनियाभर की सरकारें और टेक्नोलोजी कंपनियां दुनिया को नई दिशा दे रही हैं. आगे भविष्य कैसा होगा यह तय नहीं लेकिन आज जैसा तो बिल्कुल नहीं होगा.