एशिया के सबसे अमीर बैंकर उदय कोटक ने क्यों दी बड़ी चेतावनी? जानें क्या है दिक्कत?

एशिया के सबसे बड़े अमीर बैंकर उदय कोटक के मुताबिक बैंकिंग इंडस्ट्री के सामने एक बड़ी मुसीबत आने वाली है. इसके अलावा पिछले हफ्ते ही यह खबर आई थी कि भारतीय बैंकों ने बीते 10 साल में 16.35 लाख करोड़ रुपए के कर्ज को राइट ऑफ यानी माफ किया. संसद में पेश किए गए ताजा सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 2018-19 में सबसे ज्यादा 2.36 लाख करोड़ रुपए के कर्ज माफ हुए. तो सबसे पहला सवाल मन में यह आता है कि क्या सब कुछ ठीक नहीं है?

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बैंकिंग इंडस्ट्री के सामने एक बड़ी मुसीबत आने वाली है. यह एशिया के सबसे बड़े अमीर बैंकर उदय कोटक का कहना है. अब आरबीआई की मीटिंग से पहले देश के सबसे अमीर बैंकर उदय कोटक ने ऐसा क्यों कहा? क्या बैंक पूरी तरह से बर्बाद हो जाएंगे? क्या बैंकों की कमाई कम है और खर्च ज्यादा? उदय कोटक ने बैंकों की स्थिति पर चिंता जताई. उनका कहना है कि बैंकों के पास डिपॉजिट कम होती जा रही है.

इससे बैंकों को नुकसान हो सकता है. उन्होंने कहा कि बैंकिंग इंडस्ट्री घटते हुए मार्जिन के खतरे का सामना कर रही है. सस्ते रिटेल डिपॉजिट की धीमी ग्रोथ के चलते बैंक महंगे होलसेल डिपॉजिट का सहारा ले रहे हैं और नेगेटिव मार्जिन पर उधार दे रहे हैं. उदय कोटक ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर एक पोस्ट में लिखा कि अगर डिपॉजिट शॉर्टेज जारी रहती है, तो यह बैंकिंग बिजनेस मॉडल को खतरे में डाल देगी.

लोग कमाई से ज्यादा कर देते है खर्च

पिछले कुछ वर्षों से लोगों में बचत की आदत जो है वह खत्म सी हो गई. लोग कमाते हैं और खर्च कर देते हैं. जरूरत पड़ती है तो उधार भी ले लेते हैं. बड़ी संख्या में यूथ जो है ऐसा ही कर रहे हैं. निवेश के नए माध्यम आ जाने से यानी शेयर मार्केट में पैसा लगाना, बिटकॉइन में पैसा लगाना हो, म्यूचुअल फंड्स में पैसा इन्वेस्ट करना हो, इन सब से पैसा जो है बैंकों में डिपॉजिट करने का चलन कम हो रहा है. यानी बैंकों में पैसा नहीं जा रहा. पहले लोग अपने सेविंग अकाउंट में और एफडी में बड़ी रकम रखते थे. अब यह चलन घट रहा है. इससे बैंकों में रिटेल डिपॉजिट ग्रोथ कम हो रही है. ऐसे में लोन देने के लिए बैंकों को होलसेल डिपॉजिट लेना पड़ रहा है.

अब बैंकों को कैसे नुकसान उठाना पड़ रहा है?

उदय कोटक ने बताया कि होलसेल डिपॉजिट पर 8% के अलावा और भी खर्चे हैं जैसे कि कैश रिजर्व रेशियो यानी सीआरआर. अब सीआरआर क्या होता है? सीआरआर का मतलब है कि बैंकों को अपनी जमा राशि का कुछ हिस्सा आरबीआई के पास रखना होता है, जिस पर उन्हें कोई ब्याज नहीं मिलता. इसके अलावा स्टेच्युटरी लिक्विडिटी रेशियो यानी जिसको कि आप एसएलआर के नाम से जानते हैं, जैसे कॉस्ट भी हैं. अब एसएलआर का मतलब है कि बैंकों को अपनी जमा राशि का कुछ हिस्सा सरकारी बॉन्ड में निवेश करना होता है.

डिपॉजिट इंश्योरेंस और प्रायोरिटी सेक्टर के टारगेट्स भी हैं. अब डिपॉजिट इंश्योरेंस का मतलब है कि अगर बैंक डूब जाता है तो जमाकर्ताओं को यानी डिपॉजिटर्स को उनकी जमा राशि का कुछ हिस्सा वापस मिल जाएगा. प्रायोरिटी सेक्टर के लक्ष्य का मतलब है कि बैंकों को अपने लोन का कुछ हिस्सा कुछ खास सेक्टर्स को देना होता है. कोटक ने कहा कि इन लागतों के बावजूद बैंक जो हैं 8.5% की फ्लोटिंग रेट पर होम लोन दे रहे हैं. जबकि बैंक 9% पर उधार ले रहे हैं जिसके परिणामस्वरूप यानी रिजल्ट के तौर पर 0.5% का नेगेटिव स्प्रेड हो रहा है.

रेपो रेट में फिर हो सकती है कटौती

आरबीआई की मॉनिटरी पॉलिसी कमेटी की जो बैठक है वह अगले कुछ दिनों में होने वाली है. माना जा रहा है कि इसमें रेपो रेट में फिर कटौती हो सकती है. इसलिए कॉस्ट और लोन की रीट्स दोनों को मैनेज करना बड़ी चुनौती है. अधिकांश जो इकोनॉमिस्ट हैं उन्होंने अप्रैल में रेपो रेट में 0.25% की कटौती का अनुमान लगाया है. इससे पहले फरवरी में आरबीआई ने रेपो रेट को 0.25% घटाकर 6.25% किया था. अब बैंकों की सेहत की बात चल रही है तो ऐसा नहीं है कि सब कुछ खराब ही है.

अच्छी खबर यह भी है कि भारतीय बैंक खासकर सरकारी बैंकों की हालत में सुधार हुआ है. आरबीआई की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक बैंकों के खराब कर्ज यानी ग्रॉस एनपीए सितंबर 2024 में 13 साल के सबसे निचले स्तर 2.5% पर आ गए हैं जो कि मार्च 2024 में 2.7% थे. नेट एनपीए भी 0.62% से घटकर 0.57% हो गए हैं. अगर बात करें सरकारी बैंकों के ग्रॉस एनपीए की तो सितंबर 2024 में यह घटकर 3.12% पर पहुंच गए हैं जबकि मार्च 2018 में यह 14.58% के उच्चतम स्तर पर थे.